September 27, 2021

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अंग्रेजों को खदेड़ लुधियाना में स्थापित की थी आजाद हकूमत : उस्मान रहमानी

लुधियाना (DVNA)। दस्तान-ए-लुधियाना के लेखक व नायब शाही इमाम मौलाना मुहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी ने आज यहां ऐतिहासिक जामा मस्जिद से जारी ब्यान में कहा कि भारत की पहली जंग-ए-आजादी 1857 ई.के महानायक और प्रथम शाही इमाम मौलाना शाह अब्दुल कादिर लुधियानवी को भुला दिया गया है।

उन्होंने बताया कि शाह जी का जन्म 1791 ई. में जिला लुधियाना के गांव बलियावाल में हाफिज अब्दुल वारिस के घर हुआ था। शाह जी ने अपनी उच्च शिक्षा दिल्ली में भारत के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना शाह वलीउल्लाह मुहद्सि देहलवी से प्राप्त की थी। मौलाना शाह अब्दुल कादिर अपने समय के पंजाब में सब से माहिर इस्लामी विद्वान और सूफी संत थे, आपके प्रवचन सुनने के लिया रोजाना ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते थे, आप सामाजिक बुराईयों के साथ देश में कब्जा जमा चुकी अंग्रेज सरकार के खिलाफ भी भाषण दिया करते थे। अंग्रेजों ने आपको रोकने के लिए कूटनीति अपनाई और आपको पंजाब के काजी के पद की पेशकश की, जो शाह जी ने ठुकरा दी। उसी समय जब अफगानिस्तान के बादशाह शाह शुजा उल मुल्क व उसका भाई शाह जमान लुधियाना में राजनीतिक शरण प्राप्त कर रहने लगे तो बादशाह को अंग्रेज सरकार ने लुधियाना का सम्मान के तौर पर शासक बना दिया, अफगान बादशाह और उसका भाई भी मौलाना शाह अब्दुल कादिर लुधियानवी के शीष्य बन गए और जब इनकी ओर से शहर में शाही मस्जिद का निर्माण किया गया तो मौलाना शाह अब्दुल कादिर लुधियानवी को बादशाह ने शाही इमाम बनाया व शाही मस्जिद का प्रबंध भी आपके परिवार को सौंपा गया। उस्मान रहमानी ने बताया की 1857 ई. की 9 जून से लेकर 12 जून तक शहर में अंग्रेजों से लड़ाई के बाद लुधियाना के लोधी किले से अंग्रेजों को खदेड़ कर आप के बड़े बेटे मौलाना सैफ उर रहमान ने शहर में आजाद हकुमत की स्थापना कर दी थी, दिल्ली से आपको बहादुर शाह जफर की ओर से संदेश आया कि पंजाब के सभी हिंदू मुस्लिम सिख फोजियों को एकत्रित कर दिल्ली पहुंचे, शाह जी ने यह संदेश पंजाब की सभी छावनियों को भेजा और फिर जालंधर छावनी और फिरोजपुर छावनी व अन्य जगह से बागी फौजियों को लुधियाना में एकत्रित कर अपने मुरीदों को साथ लेकर दिल्ली की ओर कूच गए, जहां बहादुर शाह जफर की अगुवाई में 1857 ई. की जंग-ए-आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी, दिल्ली में उस समय देश के सभी हिस्सों से इंकलाबी फौजी आए हुए थे और इसी बीच जब वहां एकत्रित हुए देश के बड़े मौलवियों में जब यह बात चली कि अंग्रेज के खिलाफ जिहाद का फतवा दिया जाना चाहिए कि नहीं तो मौलाना शाह अब्दुल कादिर लुधियानवी ने आगे बढ़ कर अंग्रेज सरकार के खिलाफ फतवा जारी किया, यह पहला फतवा था जो अंग्रेजों के खिलाफ दिया गया था। शाह जी ने दिल्ली में हो रहे युद्ध में हिस्सा लिया इस बीच आपकी पत्नी और पंजाब के इंकलाबी फौजी शहीद हुए, आपकी पत्नी की कब्र शाही मस्जिद फतेहपुरी के आंगन में बनाई गई जो आज भी मौजूद है, 1857 ई. की इस जंग में शाह जी का पूरा परिवार इंकलाबी फौजियों व मुरीदों सहित अग्रेंजो के खिलाफ लड़े थे। 1857 ई. की जंग इंकलाबी जीत नहीं सके और अंग्रेज ने इसको गदर का नाम दे दिया, जिसके बाद अंग्रेजी जुल्म शुरू हुआ। लुधियाना में शाह जी की मस्जिद और उनके घर अगं्रेजी सरकार की ओर से गिरा दिए गए व आपके बागात जब्त कर लिए गए, आपके पुत्र मौलाना शाह मुहम्मद लुधियानवी, मौलाना शाह अब्दुलाह लुधियानवी और मौलाना शाह अब्दुल अजीज लुधियानवी को गिरफ्तार कर लिया गया, और शाह जी का साथ देने वालों को लुधियाना के गिरजा घर चौंक में फांसियां दी गई, मौलाना शाह अब्दुल कादिर लुधियानवी को दिल्ली से राजपूत मुसलमान अपने गांव सुतलाना जिला पटियाला ले गए थे, जहां 1860 ई. में आपका देहांत हो गया और आपकी कब्र पटियाला सुतलाना मार्ग पर एक खेत में बनाई गई। मौलाना शाह अब्दुल कादिर लुधियानवी देश के उन महान स्वतंत्रता सैनियों में से हैं जिन्होने आजादी के लिए अपना तन-मन-धन सब कुछ निशावर कर दिया लेकिन अंग्रेज के सामने झुके नहीं। 1857 ई. की जंग-ए-आजादी का इतिहास लिखने वाले वीर सावरकर ने अपनी किताब में आपका विस्तार से जिक्र किया है। शाह जी के बाद जब आपके पुत्र अंग्रेजों की कैद से रिहा होकर लुधियाना आए तो उन्होने ना सिर्फ गिरा दिए गए मकानों और मस्जिद को बनवाया बल्कि अपने महान पिता की राह पर चलते हुए अंग्रेजों से जंग जारी रखी। लुधियाना से देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ प्रसिद्ध हुए स्वतंत्रता सेनानी अहरार पार्टी के संस्थापक मौलाना हबीब उर रहमान लुधियानवी प्रथम शाह जी के ही पड़पोते हैं।

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