November 28, 2021

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कोरोना संकट में पढ़ें एक ऑटो रिक्शा वाले शिक्षक के जीत की कहानी

कोरोना संकट में पढ़ें एक ऑटो रिक्शा वाले शिक्षक के जीत की कहानी

पटना। आरके श्रीवास्तव के पिता पारस नाथ लाल बिहार राज्य के रोहतास जिले के राजपुर (जमोधी) गाँव में रहते थे। वे गाँव में खेती करते थे, लेकिन जब उनके सात बच्चे थे, तो कमाई कम पड़ने लगी। इसलिए खेती के साथ, वह बिक्रमगंज शहर में आए और एक प्रिंटिंग प्रेस चलाना शुरू किया ताकि परिवार का सही ढंग से भरण पोषण हो सके।

दिन रात परिश्रम करने लगे, जिससे ज्यादा पैसा सामुहिक परिवार चलाने के लिये मिल सके। लेकिन कुछ साल बाद वे इतने बीमार रहने लगे जिससे काम करना मुश्किल हो गया। वे चौबीसों घंटे खेती के साथ साथ प्रेस मे काम करते थे और खेती के दौरान चुभी काटी और शुगर की बिमारी से हुआ वह घाव कुछ महीनो मे एक बड़ा रूप ले लिया।

आरके श्रीवास्तव के पिता पारस नाथ लाल के बड़े भाई कोलकाता मे रह्ते थे तो वे ईलाज के लिये उन्हे कोलकता बुला लिया, परंतु डॉक्टर ने बोला की घाव आगे न बढ़े इसके लिये इनका एक पैर काटना पड़ेगा। ऑपरेशन के कुछ घंटे बाद ही होश में आने के बाद वे इस दुनिया को छोड़ चले गये।

अब आरके श्रीवास्तव के बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी महज 15 साल की उम्र में आ गई। छोटे भाई रजनी कांत श्रीवास्तव (आरके श्रीवास्तव), जिन्हें वे प्यार से सोनू बुलाते थे, को यह चिंता सताने लगी थी कि पढ़ाई लिखाई सहित परिवार की जिम्मेदारी कैसे उठायी जाए।

पिता के दुःख में डूब जाने के कई दिनों बाद, उन्होंने कुछ पैसे उधार लिए और एक ऑटो रिक्शा खरीदा। ऑटो रिक्शा के प्रति दिन 100 से 200 रुपये की आय के साथ, छोटे भाई की शिक्षा और परिवार को बनाए रखा जाने लगा। माँ आरती देवी और बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव की बहुत इच्छा थी कि आरके श्रीवास्तव किसी तरह पढ़े-लिखें। माँ खुद कभी स्कूल नहीं गई, लेकिन अपने बच्चे को सुबह स्कूल भेजने में संकोच नहीं किया।

गांव के उस सरकारी स्कूल में पढ़ाई अच्छी नहीं होती थी, लेकिन दूसरा विकल्प भी नहीं था। आरके श्रीवास्तव पहली कक्षा में थे जब उनके पिता इस दुनिया को छोड़कर चले गए। बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव की अथक मेहनत के साथ, समय धीरे-धीरे बीतता गया और रजनी कांत श्रीवास्तव (आरके श्रीवास्तव) ने पढ़ाई में कड़ी मेहनत की। नई किताबें खरीदने के लिए कभी पर्याप्त पैसा नहीं मिला। वह किसी से पुरानी किताबें उधार लेकर अपना काम चलाता था।

जिस दिन ऑटो रिक्शा खराब होता, उस दिन परिवार को भूखे सोने के लिए मजबूर होना पड़ता । बच्चों को भूखा देखकर माता आरती देवी की आत्मा कराह उठती, लेकिन उनके हाथ में कुछ नहीं था।

वे बच्चों को समझातीं कि इस गरीबी से निकलने का एक ही जरिया है, पढ़ाई और सिर्फ पढाई। रजनी कान्त श्रीवास्तव (आरके श्रीवास्तव) को उनकी बात बचपन में ही समझ आ गई। जब वह दसवीं में पहुंचे तो पहले से और मेहनत करने लगे। फिर वह अच्छे अंकों से दसवीं पास हो गये और अब आगे पढ़ाई की चुनौती थी। इसी दौरान आरके श्रीवास्तव अब खुद अपने से नीचे क्लास के स्टूडेंट्स को पढ़ाना शुरु किया, जिससे जो पैसे उन्हे मिलते उससे उनके आगे के पढ़ाई का खर्च निकलते गया।

उन्होंने अपनी शिक्षा के उपरांत गणित में अपनी गहरी रुचि विकसित की। आरके श्रीवास्तव अपने पढ़ाई के दौरान टीबी की बीमारी के चलते नही दे पाये थे आईआईटी प्रवेश परीक्षा। उनकी इसी टीस ने सैकड़ो स्टूडेंट्स को इंजीनयर बना दिया। आर्थिक रूप से गरीब परिवार में जन्मे आरके श्रीवास्तव का जीवन भी काफी संघर्ष भरा रहा।